Saturday, 13 April 2013

कलयुग का असली चेहरा



१९८०-८१ में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग महाभारत के प्लॉट का इस्तेमाल करते हुए भी इससे स्वयं को अलगा लेती है। इसके चरित्र असल में महाभारत के चरित्र न होने पर उन चरित्रों सरीखे दीखते हैं। इस फिल्म का निर्माण शशि कपूर ने किया था जिसमे महाभारत की कथा का सहारा लेते हुए समकालीन संदर्भों में एक ही वंश के दोऔद्योगिक घरानों के बीच की प्रतिस्पर्धा को दिखाने का प्रयास किया गया था यहप्रतिस्पर्धा कब एक युद्ध में परिणत हो जाती है इसका पता नहीं चलता। संभवत् निर्देशकको भी नहीं, यह फिल्म का एक असंतुलित पक्ष है। कैसे एक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा मेंशामिल लोग आँख के बदले आँख की मांग करने लगते हैं फिल्म में इसका प्रदर्शन है। गाँधीजी ने कहा था कि अगर आँख के बदले आँख की मांग की गई तो सारी दुनिया अंधी होजाएगी। गाँधी इस बात को कहते हुए अपने युग के महायुद्धों-विश्वयुद्धों को ध्यान में रखे थे। कलयुग के चरित्र इसे अपनी स्मृति से विस्मृत  करने में ही संलग्न दिखते हैं।

हालाँकि कलयुग श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक ऐसी फिल्म है जिसमे महाभारत की कथा को अपनी पटकथा का आधार बनाया है लेकिन यह तब भी महाभारत की कथा न होकर उस कथा की कलयुगीन(समकालीन) दशा का चलचित्रांकन है एक अन्य संदर्भ में कलयुग महाभारत नामक महाकाव्य का संदर्भ बिंदु है। हाँ केवल संदर्भ-बिंदु , समकालीन संदर्भ-सापेक्षता में उसका मूल्याँकन नहीं। यही मेरे लिए इस फिल्म को ख़ास बनाता है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में महाभारत की कथा का केवल आधुनिक संदर्भ-बिंदु खोजने की कोशिश करते हैं और उसे बखूबी रूप में अभिव्यक्त भी करते हैं लेकिन उसका मूल्याँकन वह दर्शक पर छोड़ते हैं। श्याम बेनेगल ने उस रिस्क को उठाते हैं जिसे बहुत सारे निर्देशक छूना नहीं चाहते। एक एपिक पर उसकी कथा को उठाकर भी न उठाना श्याम बेनेगल ने संभव किया है। रचनाकार के समक्ष इस तरह का जोखिम हमेशा रहता है। ऐसा जोख़िम स्वयं धर्मवीर भारती को अंधा-युग लिखते वक्त भी था

श्याम बेनेगल की कलयुग के संदर्भ में मुझे धर्मवीर भारती का अंधा-युग यदि याद आता है तो उसका कारण भी यही है। जैसा अंधा युग की भूमिका में धर्मवीर भारती लिखते हैं -  परएक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर को चुनौती को स्वीकार करने का,पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोरकर, बचाकर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत और उससे पहले और स्वतंत्रता या विभाजन के दौरान का भारतबार-बार इस कलयुग को देखता रहा है। निश्चित ही यह युग आस्था की मृत्यु के पश्चातजन्मा था जिसके बीज द्वापर युग में ही डल गये थे। जब महाभारत संभव हुआ। बेनेगलधर्मवीर भारती की भाँति महाभारत की कथा की समकालीन संदर्भ-सापेक्षता का मूल्याँकननहीं करते। इससे कई समीक्षकों के लिए यह फिल्म बेनेगल जैसे बड़े निर्देशक की एक कमज़ोर फिल्म मानी जा सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह कमज़ोरी ही फिल्म की सबसे बड़ी खूबी मानी जानी चाहिए। महाभारत और अंधायुग कृष्ण केंद्रित कथा कहता है जबकिकलयुग की कथा करन (कर्ण) की केंद्रीयता की कथा है। कलयुग की आंतरिक अर्थसत्ता कामूल्याँकन तभी संभव है जब करन (कर्ण) की आधुनिक संदर्भवत्ता का मूल्याँकन दर्शक कर सके। संभवत् यहीं से श्याम बेनेगल दर्शक के लिए समीक्षा की राह बनाते हैं। मुझे ये उनके बहुत बाद की फिल्म ग़ुलाल (अनुराग कश्यप) की फिल्म में गाये पीयूष मिश्रा के गीतों में मिलती है इस फिल्म के एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का समकालीन संदर्भ मे गायन करते हैं। कहीं कहीं इस गीत में कलयुग का केद्रीय विचार छिपा है -
ये देख गगन मुझमे में लय है, ये देख पवन मुझमें लय है।
मुझमें लय है संसार सकल, मुझमे धरती आकाश सकल
ये देख महाभारत का रण, मुर्दों से भरी हुई भू है।
पहचान कहाँ इसमे तू है।
कलयुग महाभारत के चरित्रों को आज के संदर्भ में और समय की इस वर्तमानता में खोजने की कोशिश करती है। कुछ लोग कहेंगे कि यह महाभारतयुगीन चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण है पर ऐसा कहकर कहीं न कहीं हम इस फ़िल्म से हट जाते हैं। मैं कहूँगा यहफ़िल्म महाभारत के चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण ही नहीं बल्कि महाभारत की वर्तमान संदर्भसापेक्ष पैरोडी है और निश्चित ही जिसमें समकालीन समयबोध शामिल है।
मुझे फिर पीयूष मिश्रा याद आते हैं -
इस देश में जिस शख़्स को जो काम था सौंपा।
उस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।।

कलयुग में जितने भी किरदार (शख़्स) हैं कहीं न कहीं वो अपने काम की कार्यविधियों का विरोध करते हैं कलयुग का मूल संकट और अंधा-युग का मूल संकट यहां आकर एक समान हो जाता है। अनास्था यहाँ भी हावी है विश्वास की डोर यहाँ भी टूटती है। महाभारत में जहाँ कर्ण और दुर्योधन का मैत्री विश्वास अंत तक कायम था कलयुग में धनराज के मन मेंकरन के प्रति अविश्वास बढ़ता है। वह उसे दग़ाबाज़ मानता है और करन की मौत के बादआत्महंता बनता है।

Saturday, 6 August 2011

सिनेमा पर लिखने की कोशिश में ...

फिल्मे मेरी तन्हाई की साथी पहले नहीं हुआ करती थी। फिल्में देखना कब मेरा शौक बन गया, इसका भी मुझे पता नहीं लगा। पर हाँ इतना ज़रूर है कि आज ये मेरे लिए सिर्फ शौक और हमदम नहीं है एक विचार भी है। जो शायद पहले ही हो जाना चाहिए था खैर मेरी पहली फिल्म समीक्षा दिबाकर बेनर्जी की फिल्म लव,सेक्स और धोखा पर लिखी गयी थी और सच कहूं तो वो एक टिपण्णी थी बस। और कुछ शुरुआत उसकी कमेन्ट के रूप में ही हो गयी फिर जब मैंने अपने एक दोस्त को उसे पढाया तो उसने बहुत अच्छा रेस्पोंस दिया बस मैंने उसे अपने ब्लॉग पर अपलोड कर दिया. इस तरह से फिल्में मेरे लिए एक शौक से विचार में तब्दील हो गयी। अब शायद मुझे फिल्में देखने की लत लग चुकी है। आज हालत यह है कि मेरी पीएच.डी का  पूरा शोध बाकी पड़ा है और मैं हूँ कि अब भी चिल्लर पार्टी, डैली-बेली,इकुरु , ख़ामोशी के फेर में पड़ा हूँ . मेरी एक दोस्त मुझे बार बार आगाह करती है कि तरुण पहले पीएच.डी कर ले फिर देख लियो ये सारी फिल्में , पर दिल है कि मानता नहीं। और मैं उसका दिल रखने के लिए ठीक है यार तू ठीक कह रही अब नहीं देखूंगा कोई मूवी जब तक अपनी रिसर्च न  निपट जाए. लेकिन उसका फोन रखने के तुरंत बाद लैपटॉप खोलता हूँ टोरेंट पर डाउनलोडिंग के लिए थोडा सा रूमानी हो जायें, तीन बत्ती चार रास्ता, पार, प्यासा,बंदिनी,सिद्धेश्वरी, द क्लाउड डूर(मणि कॉल) लगाता  हूँ और बार बार देखता हूँ कि कितनी डाउनलोड हुई है मेरी दोस्त का फिर फोन आता है क्या कर रहे हो? पूछती है . मैं कहता हूँ पढ़ रहा हूँ वो खुश हो जाती और ये जानकर की कहीं मेरी लय न टूट जाये वो फोन रख देती । मैं उसे झूठ भी बोलने लगा जबकि मैं जानता हूँ कि वो मेरे प्रति फिक्रमंद है।कई बार मुझे लगता है कि ये  फिल्मों के प्रति मेरी दीवानगी है क्या गलत लगता है?  
आज ये नया ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ ये सिर्फ सिनेमा के लिए होगा . यूं मेरा एक ब्लॉग पहले ही है लेकिन मुझे लगता है कि मुझे सिनेमा पर नियमित रूप से लिखने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिय मेरे कमेन्ट जो मैं दिल रख लेता हूँ वो मुझे यहाँ पेस्ट करने चाहिए देखें कितना आगे बढ़ पाता हूँ इस सिलसिले में।