Saturday, 6 August 2011

सिनेमा पर लिखने की कोशिश में ...

फिल्मे मेरी तन्हाई की साथी पहले नहीं हुआ करती थी। फिल्में देखना कब मेरा शौक बन गया, इसका भी मुझे पता नहीं लगा। पर हाँ इतना ज़रूर है कि आज ये मेरे लिए सिर्फ शौक और हमदम नहीं है एक विचार भी है। जो शायद पहले ही हो जाना चाहिए था खैर मेरी पहली फिल्म समीक्षा दिबाकर बेनर्जी की फिल्म लव,सेक्स और धोखा पर लिखी गयी थी और सच कहूं तो वो एक टिपण्णी थी बस। और कुछ शुरुआत उसकी कमेन्ट के रूप में ही हो गयी फिर जब मैंने अपने एक दोस्त को उसे पढाया तो उसने बहुत अच्छा रेस्पोंस दिया बस मैंने उसे अपने ब्लॉग पर अपलोड कर दिया. इस तरह से फिल्में मेरे लिए एक शौक से विचार में तब्दील हो गयी। अब शायद मुझे फिल्में देखने की लत लग चुकी है। आज हालत यह है कि मेरी पीएच.डी का  पूरा शोध बाकी पड़ा है और मैं हूँ कि अब भी चिल्लर पार्टी, डैली-बेली,इकुरु , ख़ामोशी के फेर में पड़ा हूँ . मेरी एक दोस्त मुझे बार बार आगाह करती है कि तरुण पहले पीएच.डी कर ले फिर देख लियो ये सारी फिल्में , पर दिल है कि मानता नहीं। और मैं उसका दिल रखने के लिए ठीक है यार तू ठीक कह रही अब नहीं देखूंगा कोई मूवी जब तक अपनी रिसर्च न  निपट जाए. लेकिन उसका फोन रखने के तुरंत बाद लैपटॉप खोलता हूँ टोरेंट पर डाउनलोडिंग के लिए थोडा सा रूमानी हो जायें, तीन बत्ती चार रास्ता, पार, प्यासा,बंदिनी,सिद्धेश्वरी, द क्लाउड डूर(मणि कॉल) लगाता  हूँ और बार बार देखता हूँ कि कितनी डाउनलोड हुई है मेरी दोस्त का फिर फोन आता है क्या कर रहे हो? पूछती है . मैं कहता हूँ पढ़ रहा हूँ वो खुश हो जाती और ये जानकर की कहीं मेरी लय न टूट जाये वो फोन रख देती । मैं उसे झूठ भी बोलने लगा जबकि मैं जानता हूँ कि वो मेरे प्रति फिक्रमंद है।कई बार मुझे लगता है कि ये  फिल्मों के प्रति मेरी दीवानगी है क्या गलत लगता है?  
आज ये नया ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ ये सिर्फ सिनेमा के लिए होगा . यूं मेरा एक ब्लॉग पहले ही है लेकिन मुझे लगता है कि मुझे सिनेमा पर नियमित रूप से लिखने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिय मेरे कमेन्ट जो मैं दिल रख लेता हूँ वो मुझे यहाँ पेस्ट करने चाहिए देखें कितना आगे बढ़ पाता हूँ इस सिलसिले में।

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